गांव है कहां
कहां गांव है?
उखड़ा पीपल
कहां छांव है?
फिर क्यों बूढ़ी ना पावे रे
भुला शहर में चैन....
हो जाए बेचैन शहर में,
हो जाए बेचैन,
रे अम्मा!
हो जाए बेचैन फ्लैट में
हो जाए बेचैन।
गांव छोड़ कर
बेटे चल दिए,
बहू भी कन्नी
कट गई,
खेत हैं बंजर
खलिहान वीरां,
गोठ में सीलन
पट गई,
नाममात्र का गांव बचा है
दिन में छा गई रैन.... हो जाए बेचैन.....
खेत से आलू
गायब हो गए,
राह बदल गए
सूकर,
कौन हटाए
पाट पुरानी
पानी आए
चूकर,
कोई नहीं जब आने वाला
किसे तलाशे नैन .... हो जाए बेचैन...
याद है पैठी
उसी गांव में
जब आई वो
दुल्हन,
इस माटी से
मांग सजाई
यहीं उगाया
तिलहन ,
इतराती जब मायके की
गागर में पानी लाती
तितली जैसे यहां वहां वह
जंगल में हुक्म चलाती
एक रोज
बाघ झपटकर, ले गया दूल्हा
दांत गड़ाकर पैन ...हो जाए बेचैन....
कमल किशोर पाण्डेय

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