Friday, April 10, 2026

राजमार्ग

 

पेड़ !

राजमार्ग से सटे 

इस चिनार के जंगल में

यद्यपि तुम सबसे लंबे हो,

पर अब मैं, 

सीधे देख सकता हूं तुम्हारी नाभि

क्योंकि इस ऊंचाई तक आ गई है सड़क।


पेड़!

हाथी खुरच- खुरच कर 

और पतला कर सकते हैं 

तुमको - अंधेरे में,

बन रहे फ्लाईओवर की धूल

तुमको गंदा अघोरी साधु बना सकती है,

और तुम्हारे बगल में, लगने जा रहा

मोबाइल टावर ,तुम्हें घोंसला विहीन कर सकता है।


पेड़!

अगली मुलाकात  तक

तुमको ढक सकती हैं

जंगली बेलें ,

जंगल में लगाई गई आग में

तुम भस्म हो सकते हो

कोई तस्कर सरेआम

तुमको जमींदोज भी कर सकता है।


पेड़ !

सावधान रहना

राजमार्ग से सटा जंगल

अब सबकी निगाह में है।

फ्लाईओवर, मोबाइल टावर, सिगरेट, आरियां, 

सब दिन दहाड़े घात लगाए बैठे हैं...


कमल किशोर पाण्डेय 

नाराजगी

 


भूस्खलन से-

अक्सर दरक जाती,

पहाड़ी के एक ओर मेरा गांव है ,

और दूसरी ओर राजधानी।

इन दोनों -

विजातीय दुनियाओं को ,

जोड़ती है एक बीमार सड़क,

जिसे बहुधा तोड़ देता है विधाता ।

डंगरियों से -

पुछवाई नाराजगी की वजह,

तो पता  चला -

पहाड़ नाराज है

उन लोगों से ,

जो केवल घूमने निकले थे

राजधानी की ओर,

और रह गए

वहीं के होकर ।



उन लोगों से ,

जो अब आ पाते हैं,

साल में एक बार गांव,

दिया जलाने

पितरों के नाम का ।

उन लोगों से ,

जो हवाई जहाजों में,

बिना पीठ दर्द के

लांघ जाते हैं

गढ्ढों वाली सड़कें।

इसलिए विधाता,

गढ़ देता है

खराब मौसम को,

और गिरा देता है,

गुस्से में पहाड़ियां

जो जिस पार हो,

उस पार ही बने रहो

जैसे हो

वैसे रहो


आग्रह



 शाखाें को काटा नहीं

तुम्हारी उम्मीद में

आ जाओ

मेरे आंगन के सामने

तनकर खड़े

चीड़ के पेड़ पर

लेटो, बैठो

कूहको.

मैंने बचाकर रखे हैं

मक्के के दाने

देखो, आओ

चखो.

इसकी तीखी पत्तियों से

गुदगुदाओ,

अपने - पैर के तलवे

इसके लकड़ीनुमा

फल से ढूंढ लो सारे दाने

इसमें झूलो, इससे बोलो

इसको जी लो.

तलाश


गांव है कहां

कहां गांव है?

उखड़ा पीपल

कहां छांव है?

फिर क्यों बूढ़ी ना पावे रे

भुला शहर में चैन....

हो जाए बेचैन शहर में,

हो जाए बेचैन,

रे अम्मा!

हो जाए बेचैन फ्लैट में

हो जाए बेचैन।

गांव छोड़ कर

बेटे चल दिए,

बहू भी कन्नी

कट गई,

खेत हैं बंजर

खलिहान वीरां,

गोठ में सीलन

पट गई,

नाममात्र का गांव बचा है

दिन में छा गई रैन.... हो  जाए बेचैन.....

खेत से आलू

गायब हो गए,

राह बदल गए

सूकर,

कौन हटाए

पाट पुरानी

पानी आए

चूकर,

कोई नहीं जब आने वाला

किसे तलाशे नैन .... हो जाए बेचैन...



याद है पैठी

उसी गांव में

जब आई वो

दुल्हन,

इस माटी से

मांग सजाई

यहीं उगाया

तिलहन ,

इतराती जब मायके की

गागर में पानी लाती

तितली जैसे यहां वहां वह

जंगल में हुक्म चलाती

एक रोज

बाघ झपटकर, ले गया दूल्हा

दांत गड़ाकर पैन ...हो जाए बेचैन....

कमल किशोर पाण्डेय 

Thursday, September 3, 2020

विरुद्ध

 जरा देख लें अपना लोहा 

देख लें अपनी  लहू की धधक  

फिर न ऐसी आंच मिलेगी 

फिर न ऐसी धूप खिलेगी। 


सूरज से लड़ना है हमको 

अपने अंगार बढ़ाने होंगे, 

निकलने लगे  शस्त्र समर में 

अपने नाखून बढ़ाने होंगे।  


पीछे छूट जाये ये दुनिया 

खुद को आगे करना होगा 

अपने हाथ की  बाजू से खुद 

मार्ग अपना गड़ना होगा। 

उत्तरकाशी

 माँ गंगे माँ, 

खड़े प्रवाह में तेरे,

महसूस करने दिव्यता 

हैं द्वार पर तेर। 


तुझमें तप आराधना है, 

तुझमें  स्वांस है ,

तेरी प्रबल तरंगिनि में

वो  उच्छवास  है,


जो भक्त के भटकते मन को 

दे दे आसरा 

जो तुझमें रम चुका है माँ,

स्वयं कहाँ रहा?


बहा दो सारी कालिमा 

प्रकाश घोल दो

स्वयं के जल स्पर्श से माँ 

पुत्र बोल दो। 

सांठगांठ

 रातों रात 

जंगल में बन गए मकान 

सुबह पहुँच गए

अपना हिस्सा लेने भेड़िये

आंख मूंदने का  

तय हुआ वादा

इस तरह 

कागज़ पर आ गया जंगल 

और जंगल में आ बैठी  बस्ती